शनिवार, 24 जुलाई 2021

बिहार के कुछ प्रमुख माता मंदिर

      बिहार जहां के कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनकी तुलना शक्तिपीठ से की जाती है। ये माता के मंदिर अपने एरिया में बहुत फेमस है। हम दूर दूर मंदिर घुमने जाते हैं लेकिन बगल वाले के बारे में नहीं जानते। मैं बिहार से हुं इसलिए मैं कुछ ऐसे मंदिरों को जानती हूं जहां आप घुम सकते हैं। कभी भी आपको दो दिन का छुट्टी हो परिवार सहित यहां अवश्य घुमे। बिहार स्थित शक्तिपीठ के बारे में मैंने पहले ही लिखा था इसलिए वो छोड़ कर इन मंदिरों के बारे में विस्तार से जानते हैं।


       बिहार के कुछ प्रमुख माता मंदिर..... 


     * कात्यायनी मंदिर - खगड़िया जिला के फरकिया में कोशी नदी के तट पर स्थित है। यह फरकिया के धमहरा स्टेशन के बगल में है। यहां माता का दांया भूजा गिरा था। यहां दूर दूर से लोग माता को दूध दही चढ़ाने आते हैं। जब गाय नया बच्चा देता है तो पहले यहां माता को दूध दही का भोग लगाकर ही उत्तर बिहार के लोग खाने पीने में दूध का उपयोग करते हैं। यहां सोमवार और शुक्रवार मेला लगा रहता है।


     * मुंगेर की प्रसिद्ध बड़ी मां चंडिका.... 

 यह उत्तर बिहार का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां सालों से दुर्गा मां की एक ही मुर्ति बनती है महिषासुरमर्दिनी.. यहां के मंदिर की खासियत है कि कहीं का भी मुर्ति बनाने वाला हो, कभी यहां का दुर्गा पूजा कभी ना देखा हो लेकिन जब मुर्ति बनाने बैठता है तो वहीं बनता है जो सालों से बना आ रहा है। यहां अभी भी माता की डोली कंधों पर जाती है। यह गंगा नदी के किनारे मुंगेर बसा है, बिहार के पुराने जिलों में से एक है। मुंगेर को कर्ण की नगरी भी कहा जाता है। यहां आसपास और भी घुमने की जगह है। यहां मुंगेर का किला, सीता कुण्ड, काली पहाड़ी, ऋषिकुंड, शुजा शाह का महल आदि देखने की जगह है। दुर्गा पूजा के समय यहां बहुत भीड़ लगती है।


      * जयमंगला गढ़


यह बेगुसराय से 20 किलोमीटर दूर मंझौल बाजार से 4 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां माता का मंदिर है यहां अवस्थित कांवर झील एशिया का सबसे बड़ा मीठा जल वाला झील है।‌‌‌यह 42 किलोमीटर में फैला है। यहां हर साल विदेशी पक्षी आते हैं। जयमंगला गढ़ में मां चंडी के रूप जयमंगला मां की पूजा होती है।‌‌यहां बंदर भी खुब पाए जाते हैं यहां के लोकल लोग यहां पिकनिक मनाने आते, इन विदेशी पक्षी को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। यहां खुदाई में पालवंश के समय के मंदिर होने के कुछ सबुत मिले हैं। 

     * पटन देवी - 


पटना स्थित पटन देवी जो महाराजगंज में हैं वो बड़ी पटन देवी और जो हाजीगंज स्थिति है वो छोटी पटन देवी के नाम से मशहूर है।

     * मां मुंडेश्वरी मंदिर



यह मंदिर पटना से 200 किलोमीटर और वाराणसी से 100 किलोमीटर दूर कैमूर में स्थित है। इसके सबसे पास का स्टेशन मोहनिया जिला रेलवे स्टेशन है। यह मंदिर पंवरा पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी मंदिर है। यहां का नक्काशी और मुर्ति उत्तर गुप्त कालीन है, यह पत्थर से बना अष्टकोणीय मंदिर है। मंदिर में 4 दरबाजे है जिसमें एक बंद रहता, एक बीच में पंचमुखी शिवलिंग स्थित है।यह शिवलिंग वाला पत्थर सुर्य के रोशनी के साथ रंग बदलता है। मंदिर के पश्चिमी भाग में एक नंदी की मूर्ति है।
       




      सहरसा में उग्रतारा देवी, लखनपुर वाली माता, बड़हिया वाली त्रिपुर सुंदरी माता, पूर्णिया में धीमेश्वर स्थान में छिन्नमस्तका माता, नवादा में चामुंडा मंदिर, गया में मां मंगला गौरी, बिहारशरीफ में शीतला माता, खगड़िया नया गांव में दुर्गा मंदिर, खगड़िया जिले में सन्हौली माता मंदिर है। बेगुसराय में काली स्थान स्थित काली मंदिर, बीहट दुर्गा स्थान ये सब मंदिर है जहां मन से जो मांगा जाए अवश्य पुरा होता है।

    ये सब मंदिर के बारे में सुने थे आप भी अगर और किसी मंदिर के बारे में जानते हैं तो कमेंट करें। हम उसके बारे में लिखेंगे...इन सब मंदिर में जाने के लिए सबसे पास का हवाई अड्डा पटना है।
 



मंगलवार, 20 जुलाई 2021

घर में बाजार जैसे गाढ़ा दही कैसे जमाते हैं

     दही जो हर किसी को भा जाए, गाढ़ा दही हो तो बात ही क्या है। पतली दही लोग खाने से भागते हैं और रोज बाजार से दही लाकर खाना ठीक नहीं है।आज हम आपको बाजार जैसा दही एकदम जिसे हाथ में लेकर दौड़ जाएं तो दही गिरे नहीं। कभी हमारे देवघर आइए यहां का दही मिट्टी के बर्तन में एकदम टाइट बिकता है और जो स्वाद से भरपूर भी रहता है। मुझे बचपन से ही दुध दही खाने का बहुत शौक रहा, हमारे यहां तो एक टाइम लोग दही चुरा(पोहा) अवश्य खाते। बिहार झारखंड में दही चुड़ा खाने का चलन बहुत पुराना है।


      उत्तर बिहार में खास तौर पर, मकर संक्रांति में हमारे यहां लगभग एक महीने तक लोग दही चुरा ही खाते हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम देवघर झारखंड जब दर्शन करने यात्री आते हैं तो एक बार यहां दही चुरा अवश्य खाते, अगर आप नहीं खाएं हैं कि अगली बार जब आएं अवश्य खाएं। दही चुरा, दही परांठे या केवल दही चीनी भी खाएं तब देखिए कितना मज़ा आता। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा- देवघर बैद्यनाथ धाम 


      घर पर बाजार जैसा दही कैसे जमाते हैं....

    

      सबसे पहले फूल टोन(क्रीम) या भैंस का दूध लें। 3 किलो अगर लें रहे तो उसको उबाल कर पौने तीन किलो दूध बना लें। अब गर्म दूध को खूब फेरे, लगातार एक बर्तन से दूसरे बर्तन में करते रहे। वो दूध फेन से भरा दिखाई देगा फिर भी उसे फेरते रहे, जब वो हल्का गर्म रह जाए, एक दम हल्का गर्म अब उसमें जामन डाल दें। अगर ठंड में दही जमा रहे हैं तो हल्का सा आग राख वाला हो तो उसमें ढक कर रखें या फिर 2-4 कंबल में लपेटकर रख दें। रात भर जमने दें सुबह एकदम टाइट दही तैयार। अगर गर्मी में दही जमने दें रहे तो उसको ऐसे रूम टेम्परेचर पर ढक कर रख दें।



       हमारे यहां तो दही मिट्टी के बर्तन में जमने देते, बर्तन के तली में कुटी हुई अदरक डाल देते कि स्वाद भी आता और फटने का डर नहीं रहता। कुछ लोग सुखी मिर्च डाल देते बिना तोड़े उसको तीखा पन नहीं आता, बस जमने में मदद मिलता।बस दुध का ध्यान रखना चाहिए कि फूल क्रीम या भैंस की हो।

बुधवार, 14 जुलाई 2021

वैष्णो देवी घुमने जाने के लिए जानें ये जरूरी बातें

      पिछले दो साल से कोरोना ने जीवन अस्त-व्यस्त कर रखा है।अब कहीं जाएं या नहीं जाएं, वहां क्या नियम चल रहा है अभी इन सब बातों की जानकारी जरुरी है। माता वैष्णो देवी का मंदिर खुल गया है लोग हजारों की संख्या में पहुंच रहे लेकिन अगर नियम पालन नहीं करते तो आपको वापस आना पड़ सकता है। आइए माता वैष्णो देवी के ताजा कोरोना के नियम और वैष्णो माता शक्तिपीठ में नहीं आते उसके कारण भी आपको बताएंगे..





      वैष्णो देवी घुमने जाने के लिए जाने ये जरूरी बातें....


        कोरोना काल में माता ने हम सब की रक्षा की या जिनके घर में कुछ अनहोनी हो गया तो मन बहुत दुखी हैं। घर में इतना दिन से बंद बंद दम घुटने लगा तो कोरोना नियम का पालन करते हुए माता वैष्णोदेवी के मंदिर लोग बहुत संख्या में जाने लगे हैं। कोरोना को देखते हुए सरकार ने कुछ नियम बनाए है जिसका पालन कर आसानी से आप माता वैष्णो का दर्शन कर सकेंगे.....

      * जम्मू जाने से पहले आपको कोरोना निगेटिव सर्टिफिकेट चाहिए। जो 48 घंटे पहले का हो। 

     * माता के दर्शन के लिए ओनलाइन दर्शन पर्ची बनबाना होगा तभी माता के दर्शन हो सकते। ये श्राइन बोर्ड वेबसाइट पर आसानी से मिल जाएगा।

      * यात्रा के दौरान हमेशा मास्क पहने रहें। सरकार हर जगह थर्मल स्केनिंग का व्यवस्था रखी है, कोई दिक्कत होने पर पुरा मदद करेगी।

        वैष्णो देवी मंदिर कैसे पहुंचे....

   वैष्णो देवी जाने के लिए हवाई या सड़क मार्ग किसी से आप जा सकते हैं। अगर ट्रेकिंग का शौक है या पैदल चलना अच्छा लगता है तो कटरा से 14 किलोमीटर माता का दरबार है। जो आप मजे ले कर घुम सकते। रास्ते में अर्ध कुमारी मंदिर, बाणगंगा, चारपादुका ये सब घुम सकते। अगर पैदल चला नहीं जा सकता तो पिट्ठू या पोनी( खच्चर) आसानी से मिल जाएगा। अर्धकुंवारी के थोड़ा पहले बैट्री वाला ओटो मिल जाता जो बुजुर्ग और बिमार‌ लाचार लोगों के लिए है। वहीं आपको टिकट कटाना होता और वो आपको पहुंचा देगा।

       अब कटरा जाने के लिए हवाई मार्ग- कटरा जम्मू से 50 किलोमीटर दूर स्थित है। कटरा के सबसे नजदीक का एयरपोर्ट रानीबाग एयरपोर्ट है। जो पुरे देश से कनेक्ट है फिर वहां आपको बस या टैक्सी आसानी से मिल जाएगा जो कटरा पहुंचा देगा। कटरा हेली पैड से माता मंदिर हेलीकॉप्टर द्वारा भी जा सकते हैं। इसके लिए श्राइन बोर्ड की वेबसाइट पर आसानी से टिकट मिल जाएगा। 1000-1200 के लगभग खर्च पड़ेगा। जो आपको माता का दरबार में दर्शन करा वापस ला देगा।

        रेल मार्ग - जम्मू स्टेशन हर बड़े शहरों से रेल मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। कटरा स्टेशन भी है जो मुख्य कुछ जगहों से जुड़ा है। फिर कटरा से माता दरबार तक पैदल या जैसे जाएं।  सड़क मार्ग हर जगह से जुड़ा है। 

      माता दरबार के बाद भैरों बाबा के दर्शन करने अवश्य जाना चाहिए। अगर आप यहां चल थक गए हैं तो वहां रोपवे से चले जाएं। 100-150 टिकट का भाड़ा लगाता है। 15 मिनट में दर्शन कर आ जाएंगे।

       माता दरबार में जाने से पहले आवश्यक सामान जो आपके पास अवश्य रहनी चाहिए....
        
       माता दरबार समुद्र तल से लगभग 5200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। रात यहां ठंड भरा होता है, कटरा से यात्रा शुरू करने के पहले अपने पर्स में एक शाॅल या पतला कंबल अवश्य रखें। अगर ठंड का मौसम है तब तो स्वेटर कंबल रखें। चलते समय शायद ये सामान बोझ लगने लगे लेकिन ऊपर जाने के बाद हड्डी कंपा देने वाली ठंड हो जाती। 

      ऊपर कंबल आपको किराया पर मिल जाता लेकिन भीड़ ज्यादा हुई तब दिक्कत होगी।‌‌‌हम जून में गये थे रात 11 बजे माता दर्शन के बाद एक खुले छत के नीचे ठंड से हालत खराब हो गई थी। छोटे बच्चे थे साथ में वो और परेशान हो गए थे। 

      आपको मेरा ये पोस्ट कैसा लगा कमेंट करें, शेयर करें और सब्सक्राइब करें....

    

      अगर आप कहीं घुमने जाने की प्लानिंग कर रहे तो एक बार आप कमेंट करें, आपको आपके सुविधा अनुसार हर संभव मदद की जाएगी...जय माता दी...

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

महाशिवरात्रि से पहले जानें भारत के प्रमुख शिवमन्दिर के बारे में

    महाशिवरात्रि की तैयारी शुरू हो गई है। 11 मार्च को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा, इस दिन देश के हर मंदिर, शिवालयों पर काफी भीड़ रहती है। हमारे यहां बहुत ऐसे शिव मंदिर है जो बहुत ही फेमस है। इस बार महाशिवरात्रि 11 मार्च गुरुवार को है अगर चाहे तो दो दिन की छुट्टी ले क्यों न 4 दिन के लिए घुमने चला जाए। लाॅक डाॅउन, कोरोना और वर्क फ्राम होम में बैठ कर पक गए होंगे। तो आज कुछ महत्वपूर्ण शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। पिछले पोस्ट में हम सभी ज्योतिर्लिंगों के बारे में बताएं थे। महाशिवरात्रि कब है और इसका शुभ मुहूर्त जानें


        महाशिवरात्रि से पहले जाने भारत के प्रमुख शिवमन्दिर के बारे में...... 


       12 ज्योतिर्लिंग मेरे ब्लॉग में दिए हुए हैं। इस पोस्ट में बस भारत के और जो प्रमुख शिवमन्दिर है उनके बारे में विस्तार से बता रही हुं। आप शिवरात्रि में कहीं घुमने का प्लान बना रहे हैं तो अवश्य यहां जाएं....सबसे पहले हम बात करते हैं....

       * अमरनाथ गुफा- जिसे तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। जहां बस साल के एक या डेढ़ महीने ही दर्शन किए जा सकते हैं। यहां बाबा भोलेनाथ का शिवलिंग बर्फ(‌प्राकृतिक रूप से) का बनता है और फिर पिघल जाता है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को अमर होने का रहस्य बताया था।

       * ओडिशा या उड़ीसा कहिए की राजधानी भूवनेश्वर स्थित लिंगराज मंदिर। जो यहां का सबसे पुराना मंदिर है, यह लगभग 10वीं या 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था। यहां की नक्काशी और चित्रकारी की भव्यता देखते बनती है।

      * कर्नाटक का मुरुडेश्वर मंदिर, जो उत्तर कन्नर जिले के भटकल थाने के पास एक गांव है। यहां विश्व की सबसे बड़ी दुसरी मूर्ति है। यहां रोज हजारों लोग आते हैं।कहा जाता है कि इस मंदिर का संबंध रामायण काल से है। रावण जब अपनी अमरता पाने के लिए आत्मलिंग अपने साथ ले जा रहा था तो इसी स्थान पर आत्मलिंग रखा था। बाद में रावण इसको नष्ट करने का भी प्रयास किया लेकिन बाबा तब तक यहां स्थापित हो गए। 

      * तमिलनाडु के बृहदेश्वर मंदिर वास्तुकला का‌ नायाब नमूना है। इसकी बनावट और मंदिर पर के 80 टन के कलश जो कि एक पत्थर से बना है। मंदिर के अंदर विशालकाय शिवलिंग, इसका रहस्यमय गुंबद जिसका छाया जमीन पर नहीं पड़ता ये सब लोगों को आकर्षित करता है। इस मंदिर की भव्यता को देखते हुए युनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया है। यह तमिलनाडु के तंजौर जिला में है।

      * कोटिलिंगेश्वर मंदिर जहां दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग है यह लगभग 108 फीट ऊंचा है। यह कर्नाटक के कोलार जिले में स्थित है। इसके चारों ओर करोड़ों शिवलिंग है। यहां मनोकामना पूरी होने पर लोग 1-3 फीट तक शिवलिंग स्थापित करवाते हैं। शिवलिंग के सामने विशाल नंदी और चारों ओर माता प्रावती और भगवान गणेश, श्री कुमारस्वामी और नंदी की मूर्ति स्थापित है।

      * श्रीखंड महादेव यह बहुत कठिन यात्रा में से एक है। यह 18570 फीट ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर हिमाचल के शिमला के आनी उममंडल के बर्फीली पहाड़ी पर है। यहां का शिवलिंग भी लगभग 72 फीट ऊंचा है। यहां जुलाई में यात्रा होती है।

      * दक्षिणेश्वर महादेव उत्तराखंड हरिद्वार के कनखल स्थित है। यह माता सती के पिता दक्ष के नाम पर बना है। यहां मंदिर में स्थित नंदी के कान में कोई विश मांगने से पुरा हो जाता है। महाशिवरात्रि के दिन यहां बहुत भीड़ होती है।

     * तारकेश्वर महादेव जो सिद्ध पीठों में से एक है।‌माना जाता है यहां माता लक्ष्मी ने स्वयं कुंड खोदा था। इसी कुंड के जल से यहां जल चढ़ाया जाता है। कहा जाता है भगवान शिव जब ताड़कासुर का वध कर आराम कर कर‌ रहे थे तो सुर्य की छाया उनके ऊपर आ रही थी तब माता पार्वती स्वयं 7 देवदार वृक्ष बन‌ कर वहां प्रकट हुए। आज भी माता मान उन 7 देवदार वृक्ष की पूजा की जाती है।एक तारकेश्वर महादेव मंदिर पश्चिम बंगाल के हुगली में भी है। 


       और मंदिर की जानकारी आपको अगले पोस्ट में हम बताते रहेंगे... और अधिक जानकारी के लिए सब्सक्राइब और कमेंट करें।

बुधवार, 20 जनवरी 2021

बसंत पंचमी पर बाबा बैद्यनाथ को रंग अबीर क्यों चढ़ाया जाता है

       बाबा बैद्यनाथ धाम जो द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है। यह देवघर झारखंड में स्थित है। यहां सावन माह में और बसंत पंचमी के अवसर पर लाखों की संख्या में पैदल सुल्तानगंज से लोग जल भर पैदल आते हैं। अभी बहुत से लोग मिथिलावासी पैदल बाबा को रंग अबीर चढ़ाने आते हैं। इस माघ की ठंड‌ में पैदल डांगी, कांवड़ और जल लिए चलते हैं। इनके कंधे पर 20 किलो से ऊपर का भार होता है। 

       मिथिलांचल के हर घर से एक दो लोग बसंत पंचमी पर देवघर झारखंड आते ही है। बांस का कांवर बनाते हैं जिसमें दोनों साइड टोकरी जैसे रहता है जिसमें खाने और पहनने का सामन एक तरफ और दुसरे तरफ़ जल लेकर चलते हैं। मिथिलांचल वासी मौनी अमावस्या को सुल्तानगंज से जल भरते हैं और बसंत पंचमी पर बाबा बैद्यनाथ को जल और रंग अबीर अर्पित करते हैं।

        बसंत पंचमी पर पर बाबा बैद्यनाथ को रंग अबीर क्यों चढ़ाया जाता है......

       बसंत पंचमी पर मिथिलांचल वासी तिलकहरूआ रहते हैं। माता प्रावती और सीता माता का मायका हिमालय रहने के कारण, मिथिलांचल हिमालय के हिस्से में है इसलिए उस हिसाब से मिथिलांचल वासी बाबा के साले हुए। माता प्रावती, सति और सीता के भाई मिथिलांचल वासी हैं तो बसंत पंचमी पर बहनोई भगवान शिव को को तिलकहरूआ बन‌ रंग अबीर चढ़ाते हैं।

        इस दिन पुरे हर्षोल्लास से गाना‌ गाते, फाग गाते और एक दूसरे को अबीर गुलाल डाल, मिठाई खिलाते हैं। इस दिन बाबा को विवाह का‌ न्योता देते हैं कि बारात लेकर आने का। तब शिवरात्रि में फिर धूमधाम से विवाह होता है। ये परंपरा बस बाबा बैद्यनाथ धाम में ही मनाई जाती है। और कहीं ये परंपरा देखने या सुनने को तो नहीं मिलता है।

      ये परंपरा ऋषि मुनियों द्वारा ही शुुरू    किया गया था जिसे ‌आज भी मिथिलावासी बहुत ही श्रद्धा से मानते हैं। इस‌ 
दिन बाबा को आम का मंजर, गाय का घी, पंचमेवा, पान, मालपुआ, धान की बाली, शनि का पत्ता‌ चढ़ाया जाता है। श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में तिलक चढ़ाया जाता है।     देवघर के आसपास के घुमने की जगह देवघर आए तो इन जगहों पर अवश्य घुमने जाएं। 

        देवघर कैसे पहुंचे......  अगर आप देवघर गाड़ी से आना चाहते है तो पटना, रांची, भागलपुर, आसनसोल कहीं से भी बस मिल जाएगी। रेलमार्ग से आने के लिए इसका सबसे बगल का स्टेशन जसीडीह है जो देवघर से 7 किलोमीटर है, वहां से आपको कोई भी ओटो 10 रूपए में टावर चौक देवघर छोड़ देता है फिर वहां आपको होटल की सुविधाएं हैं। या 20 रूपए रिक्सा मिल जाता है आपको मंदिर छोड़ देगा। हवाई यात्रा के लिए हावड़ा, पटना या रांची में आप उतर जाएं। कुछ दिन में देवघर हवाई अड्डा भी शुरू होने वाला है।

बुधवार, 13 जनवरी 2021

कुंभ मेला 2021, हरिद्वार के आसपास के दर्शनीय स्थल

        कुंभ स्नान मेला कल‌ से हरिद्वार में शुरू हो गया है। इस यह हरिद्वार में मेला लगा है।‌ कल यानी 14 जनवरी को लगभग 7 लाख से अधिक लोगों ने स्नान भी किया। कुंभ मेला नहाने जाते हैं तो एक दो दिन अलग से अवश्य रखिए, कि अगल‌ बगल‌ के भी कुछ जगह घूम सके। हां अभी हो सकता कि भीड़ बहुत हो लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम से छुट्टी कम ली मिल पाती इस लिए एक बार गए हैं तो पुरा घुम ही लें।

कुंभ मेला 2021 जानिए कब-कब है शाही स्नान

       ये कुंभ मेला अभी अप्रैल भर चलेगा, आपको जब भी 3-4 दिन की छुट्टी मिले हरिद्वार या उसके आसपास घुम सकते हैं या फिर पुरे उत्तराखंड भी, लेकिन उसके लिए थोड़ा छुट्टी बढाना‌ पड़ेगा। हम इस पोस्ट में आपको हरिद्वार, उत्तराखंड के ‌आसपास घुमने के बारे में विस्तार से जानकारी दें रहे हैं।‌आपको पसंद आए तो लाइक, कमेंट और शेयर करे।

हरिद्वार उत्तराखंड जाएं तो इन जगहों पर अवश्य जाएं

        कुंभ मेला 2021, हरिद्वार के आसपास के दर्शनीय स्थल.......


        हरिद्वार जिसे हरी का द्वार कहा जाता है। इसे मोक्ष का द्वार भी कहा जाता है। यही से आप गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ धाम, केदारनाथ धाम, की यात्रा शुरू करते हैं। यहां का वातावरण, कल कल बहती गंगा, रोज शाम हजारों दिए जो मां गंगा के पानी में प्रवाहित होने पर, हर दुख दर्द भूल जाएं उस नजारे को देख, गंगा आरती एक बार शामिल होने पर कभी ना भूल पाएंगे। 

        हरिद्वार में तो बहुत सारे घाट है लेकिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण घाट है हर की‌ पौड़ी जहां माना जाता है कि अमृत कलश से जो बुंद गिरी थी वो यही जगह है। इस घाट पर लोगों की मान्यता है कि यहां स्नना करने से मोक्ष प्राप्त होता है। इस घाट पर बहुत भीड़ लगता है। यहां भगवान विष्णु प्र्रकट हुए थे इसलिए  यहां भगवान विष्णु का पदचिन्ह भी मौजूद हैं।यहां  शाम की गंगा आरती, इस घाट पर मुंंडन संस्कार, अस्थि विसर्जन, भी होते हैं।

        यहां आसपास बाजार बहुत सुंदर हैं लेकिन बाहरी देेेख ठगते भी‌ है इन सब से थोड़ा जिद करें, तो फिर कम कर दें देते। यहां रिक्शा ओटो आपको थोड़ा उल्लू बना सकते। अब सभी एक जैसे नहीं ‌होते लेकिन आपको ध्यान रखना होगा।‌ मैं गई थी तो एक रिक्शे वाले को बोली जरा हर की पौड़ी तक छोड़ दो अब मुझे वहां का आइडिया था नहीं, होटल‌ वाला बोला बस 10 कदम पर है फिर भी नया जगह मैं सोची किसी रिक्से वाले को कहती।‌ वो बोला 60 दें दीजिए मैं बोली वो तो बगल में ही है। बोला ना आपको क्या पता मुझे 15 मिनट घुमाया बस पहुचा दिया। मैं क्या करती रूपए दिए जब उधर से आने लगी सोचे किसी दुकानदार से पूछा जाए तो देख रहे एक गली घुम हमारा होटल है। 😆😆 लेकिन अब क्या कहें उनकी कमाई का जरिया भी यही है। इसलिए थोड़ा सोच समझ कर चले।
       हरिद्वार जाएं तो विष्णु घाट भी अवश्य जाएं।‌ जहां माना जाता है कि यहां भगवान विष्णु ने एक बार स्नान किया था। विष्णु घाट हरिद्वार के प्रमुख घाटों में से एक है।

      अब हरिद्वार में शक्तिपीठ मंदिर भी है।‌ मां चंडी देवी का जो नील पर्वत पर है।‌ यह थोड़ा ऊंचा है इसलिए आप वहां पैदल जाए या खटोला मिल जाता है। ये हरिद्वार से 2 किलोमीटर दूर है। ऊपर जाएं तो बीच में मां अंजनी देवी भी है उनका दर्शन अवश्य करें। ऊपर में और भी मंदिर है हनुमान जी, वैष्णव माता आदि।

     मां मनसा देवी, भारत माता मंदिर, माया देवी मंदिर, सप्त ऋषि मंदिर, भूमा निकेतन, शिवानंद धाम, तुलसी मानस मंदिर, दक्ष महादेव मंदिर, हरिहर आश्रम, विष्णु घाट, राजा जी नेशनल पार्क, पतंजलि योगपीठ, स्वामी विवेकानंद पार्क, गायत्री माता परिवार का शांति कुंज, चिल्ला अभ्यारण्य और यहां का बाजार भी।

      हरिद्वार कैसे पहुंचे....


    हरिद्वार अगर आप हवाई जहाज से जाना चाहते हैं तो देहरादून तक आप दिल्ली से आ जाएं। फिर देहरादून से आपको पुरे उत्तराखंड में कहीं जाने के लिए गाड़ी मिल जाएगी। रेल और सड़क आपको हर जगह से जुड़ी मिल‌ जाएगी।‌ दिल्ली से तो हर विकेंड में लोग प्लान कर उत्तराखंड घुमने बाइक या अपनी कार से आ जाते। हरिद्वार से आगे जाने का प्लान है या पुरा उत्तराखंड ‌वो आपको हरिद्वार टैक्सी स्टैंड या बस स्टैंड में मिल‌ जाता है।

       यहां स्टेशन का आसपास खाने और रहने का होटल ‌कम बजट में भी मिल जाएगा। 

सोमवार, 11 जनवरी 2021

कुंभ मेला 2021, उत्तराखंड, हरिद्वार जाएं तो इन जगहों पर भी अवश्य जाएं

      हेलों दोस्तों सबसे पहले मैं आप सब से माफी चाहूंगी कि इतने दिनों बाद आयी हुं। लेकिन क्या करें जिंदगी में जब तक सांस है जिम्मेदारी बहुत है। बस वही कुछ जिम्मेदारियां निभाने में आपसे दूर रही लेकिन अब आ गई हुं आप सब को फिर से सैर कराने, आप सब भी पिछले 11 महीने से बंद बंद बोर हो गए होंगे।

       ये कोरोना ने तो हम‌ जैसे घुमक्कड़ का असली दुश्मन निकला। आप सब बहुत बेताब हो रहे होगे ‌कहां चले तो लीजिए देवाधिदेव महादेव जिनके सर पर मां गंगा का वास है आपको बुला रही है। कुंभ मेला लगा है, आइए गंगा स्नान से अपने कुछ पाप धो लें। उत्तराखंड के हरिद्वार में इस बार मेला लगा है। इस मेले की जानकारी ‌आपको इस लिंक पर मिल जाएगी। हम पहले घुमने का बात कर‌ लें। 

जानिए कब-कब है शाही स्नान 

 

     मेरे मन में तो अभी से लड्डू फूट रहे। हरिद्वार जो स्वयं भगवान का द्वार कहलाता है। एक बार गई हुं लेकिन हरिद्वार, ऋषिकेश ही बस घुम पाई इस बार तो पुरे हरिद्वार घुमना है। वर्क फ्रोम होम वाली छुट्टी बस मिल‌ जाए। वैसे अगर समय ना हो एक बार पुरा घुमने का तो आधा आधा बांट कर ही घुम लें बाकी बाद में। आज इस पोस्ट में बस आपको उत्तराखंड में क्या क्या घुमने की जगह है वो बता रहे। बाकी हर जिले का अगले पोस्ट में। पोस्ट थोड़ा ‌लम्बा हो गया माफी....


     उत्तराखंड हरिद्वार जाएं तो इन जगहों पर अवश्य जाएं.....


       जय मां गंगे... उत्तराखंड देवता की भुमि कहीं जाती है। यहां मां गंगे और यमुुना उद्गगम स्थल है। भगवान स्वयं केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के रूप में रहते हैं। मां गंगा काा उद्गम स्थल गंगोत्री और यमुनोत्री दोनों देखने योग्य है। हेमकुंड साहिब,ऊखीमठ, देवप्ररयाग, मद्महेश्वर, तुंगनाथ, हरिद्वार,  हर की पौड़ी, मनसा देवी,  आदिकाशी, गुप्त काशी, मुक्तेश्वर, धाड़चुला, लक्ष्मण झुला, ऋषिकेष भी बहुत सारे मंदिर है। ये तो हो गया धार्मिक महत्व वाले स्थान।

       अब आप ट्रेकिंग करना चाहते हैं, राफ्टिंग करना चाहते हैं। घुम घुम कर थक गए हैं तो कुछ पल रोमांस का कर आराम करना चाहते हैं तो इन जगहों पर जाएं।


         ट्रैकिग और राफ्टिंग-  इसके लिए ऋषिकेश कौड़ीयाला से मुनि की रेती राफ्टिंग के लिए सबसे अच्छा जगह माना जाता है। मसुरी, लंढौरा, चमोली जिसे फूलों की घाटी भी कहा जाता है। चोपता, अल्मोड़ा, मनुस्यारी, देहरादून, चकराता, कनाताल, तपोवन, औली, रानी खेत जहां फिल्म की शूटिंग भी होती है। धनोल्टी, शटल, लैंसडाउन, जिम कार्बेट नेशनल पार्क, नंदाादेवी राष्ट्रीय उद्यान और गोविंद राष्ट्रीय उद्यान  से बहुत सारी जगह है जो आपको स्वीटजरलैंड का एहसास दिलाएगा। 


         अभी मैंने बस मुख्य मुख्य जगहों के बारे में बताया है कि आप छुट्टी थोड़ा और बढ़ा लें, इतनी सारी जगहें हैं घुमने को, अगले पोस्ट में अब एक एक जगह के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। बस आप सब बने रहे। आपकी सराहना मिली तो आपको मेरे पोस्ट में ही वहां होने का एहसास मिलेगा।

      वैसे उत्तराखंड तो पुरे साल जा सकते हैं लेकिन सावन माह मतलब जूलाई अगस्त मानसुन के कारण परेशानी हो सकती है। अभी जाने पर बर्फ भी दिखेगा। फोटो सुट, फोटो ग्राफी के लिए बहुत अच्छा समय है।


        कुंभ स्नान स्पेशल अभी रेल और ज्यादा हो सकती है।‌ वैसे सालों भर आपको किसी भी जगह से आसानी से हरिद्वार, काठगोदाम, कोटद्वार या ऋषिकेश कहीं के लिए आसानी से मिल जाएगा।‌ हवाई अड्डा भी है।‌ सड़क का तो पुरे भारत से जाल बिछा है। 


       आपको कैसा लगा मेरा पोस्ट कमेंट अवश्य करें। और आगे भी बने रहिए।

      

शनिवार, 16 नवंबर 2019

मां तारापीठ की यात्रा

       तारापीठ का नाम तो सुना ही होगा आप‌ सब ने। यह 51 शक्तिपीठ में से एक है यहां माता सती का नेत्र का तार गिरा था। इसलिए इस नयनतारा या तारापीठ कहा जाता है। यह पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में स्थित है। अभी कल ही मुझे वहां जाने का अहोभाग्य प्राप्त हुआ। प्लान तो बहुत दिन से था लेकिन माता ने जब बुलाया तभी सही है।

    इस बार परसों तक कोई खबर नहीं था कि कहीं जाना है लेकिन वो कहते हैं ना कि जब बुलावा आ जाय तो आप ना चाहते हुए भी चल जाएंगे ना तब सारा प्लान रखा का रखा रह जाता। चुकी हम देवघर से है तो यहां से तारापीठ बस 138-40 किलोमीटर दूर है। सुबह चले तो शाम को अपने घर पहुंच जाएं। मेरे पति ने वहां एक बलि देने का कबुलती मतलब बलि चढ़ाने का वादा किया था माता से क्योंकि नौकरी में प्रमोशन मांगा तो मिल गया। इसलिए सब थे कि माता जब बुला लें।




    अचानक एक दिन मेरे मामु सपरिवार शुक्रवार को आए बोले कि आएं है गाड़ी से चलिए कल सब तारापीठ चलते हैं। बस फिर क्या था माता का बुलावा आ गया तो प्लान बन गया। सुबह चार बजे सब जगे मामू बोले वो बाबा मंदिर से आ रहे तब तब हम लोग तैयार होते हैं तब चलेंगे।हम बाबा वैद्यनाथ दो दिन पहले ही गए थे तो सोचे बेटी को स्कूल भेज दें क्योंकि उसका टेस्ट था बोली हमको नहीं जाना।

    मामू 5 बजे बाबा मंदिर गए हम भी इधर बच्चों को स्कूल भेज दिए। 7 बजे तक वो लोग आ गए थे। नवंबर में ठंड हो ही जाती है लेकिन देवघर में धूप बहुत अच्छी होती है तो ठंड का अहसास नहीं होता। मैं, मेरे पति और 2 साल की बेटी सोना तारापीठ जाने को निकले। घर में पापा जी रहते है तो दोनों बड़ी बेटी को यहीं छोड़ दिए। 7 बजे हम लोग देवघर से निकल गए थे और 8.30 तक वासुकीनाथ पहुंच गए। वहां पूजा पाठ करने में 15 मिनट लगा। ज्यादा भीड़ तो नहीं थी।

    फिर 8.50 में तारापीठ के लिए निकल पड़े। तब तक धूप भी बहुत तो गई थी। रास्ता तो इतना भयंकर था, रामपुर हाट से हमलोग गए थे, पुरे रास्ते बस पत्थर तोड़ने वाले क्रेशर लगे थे। पेड़ तो नहीं था इसलिए खाली डस्ट उड़ रहे थे, छोटे मोटे छप्पड़ के घर दिख रहे थे। होटल कहीं नहीं कि कुछ नास्ता भी करा दें बच्चों को। मामू के बच्चे जो साथ आए वो लोग को भूख लग गया था। हम लोग 1 बजे तक पहुंचे तारापीठ।

     गाड़ी साइड कर एक दुकान पहुंचे, वहां लोगों से पुछने पर पता चला कि अभी माता का भोग लगाने का समय हो गया है 2.30 में पट खुलने का समय है। तब हम लोग उसी के यहां से एक पाठा खरीदें 2500 में मिल गया,छोटा सा था। जो माता को चढ़ाना था। फिर वही टोकरी में चुनरी, पेड़ा, इलाइची दाना, अलता सब लें मंदिर प्रांगण में पहुंचे। वहां भीड़ तो बहुत थी लेकिन 200 रुपया में मंदिर के जस्ट सामने खरा कर दिया हम लोग पट खुलने का इंतजार करने लगे। तब तक लोगों से मंदिर से जुड़ी कहानियां सुनने लगे।

      कहा जाता है तारापीठ मंदिर का निर्माण पहले महर्षि वशिष्ठ ने करवाया लेकिन वो कालांतर में धरती में समा गई। फिर जयवर्त‌ नाम का एक व्यापारी रहता था। वह अपने काम के सिलसिले में तारापीठ के बगल एक गांव में आया था जहां उसे स्वपन हुआ कि शमशान के बीच में एक शिला है जिसे निकाल कर वो स्थापना करें।‌ वह सवेरे जगा और वहां खुदाई किया तो शिला मिलाकर फिर वहां एक भव्य मंदिर निर्माण करवाया। इस मुर्ती में मां तारा की गोद में भगवान शिव का बाल रुप है।

    कथा सुनते सुनते हमारी बारी आ गई। हमलोग मंदिर में प्रवेश लिए वहां मंदिर के द्वार पर माता का चरण रखा हुआ है। वहीं माता को अल्ता चढ़ा प्रणाम किए। फिर आगे मूर्ति को प्रणाम कर पाठा की मूर्ति के सामने रख, बाहर वहां के पंडे ने बलि दिया। वहीं एक होटल वाले ने मीट प्रसाद पुरा निकाल दिया।

    फिर हम लोग बाहर आ गए जहां एक जगह बैठ कर पहले लैंगचा एक मिठाई था। जो गुलाब जामुन का ही एक रूप था लेकिन वो लंबा करीब 4 इन्च का था। दो खाकर पेट भर गया। फिर 4 बज गए थे जो हल्का फुल्का नाश्ता कर निकल गए, पेट भर खाना खा गाड़ी पर बैठना होगा ना। 8 बजे तक घर आएं। फिर मीट बना सब खाएं, चुंकि हम खाते नहीं नानभेज तो हम बस प्रसाद से चंदन कर लिए ।

    

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर

     आप घुमने का शौक रखते हैं या फिर भगवान शिव के भक्त हैं तो इस जगह के बारे में जरूर जानते होंगे। यह एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है।जिसे बनाने में 39 साल लगा था।इस मंदिर का नाम जटोली मंदिर है। जहां महादेव खुद वास करते हैं। यह शिव मंदिर हिमाचल की वादियों में सोलन से 7 किलोमीटर दूर स्थित है। सोलन शहर को पहचान बताने की जरूरत नहीं है, मशरूम सीटी के नाम से भी जाना जाता है।हम यहां के बारे में पुरी बात बता रहे। इस मंदिर से जुड़ी कथाएं और कैसे यहां पहुंचे........

     कैसे पहुंचें...

   सबसे पहले आपको हिमाचल प्रदेश के सोलन में आना पड़ता है। सोलन के लिए हवाई जहाज तो नहीं मिलेगी, हवाई अड्डा 66 किलोमीटर दूर चंडीगढ़ में है। फिर वहां से टैक्सी या बस मिल जाता है। रेल सोलन के लिए अच्छा है। हर प्रमुख शहरों से आपको रेल सोलन के लिए मिल जाएगा। सड़क मार्ग की भी अच्छी सुविधा है। सोलन से राजगढ़ रोड होते हुए जटोली मंदिर जाया जा सकता है। 100 सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना होगा। तब दाहिने ओर भगवान शिव की मूर्ति है।इसके 200 मीटर दूर शिवलिंग है।

      इससे जुड़ी कथाएं....

   
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव यहां आएं थे कुछ दिन रुके भी। फिर एक सिद्ध तपस्वी बाबा स्वामी कृष्णानंद परमहंस आकर यहां तप करने लगे।उन्ही‌ की‌ देखरेख में यहां मंदिर बना है। एक बार यहां पानी का बहुत अकाल पड़ा, हर जगह त्राहि त्राहि थी।तब सिद्ध बाबा परमहंस ने भगवान शिव की तपस्या कर एक जगह त्रिशूल से मारा कि खुब पानी निकल आया। आज तक फिर यहां पानी कि कमी नहीं हुई।

     मंदिर में स्फटिक की शिव लिंग रखा हुआ है। शिवलिंग के ठीक ऊपर 11 फीट ऊंचा विशाल सोने का कलश‌ स्थापित किया गया है। इसका गुंबद 111 फीट ऊंचा है इसलिए पुरे एशिया में इतना ऊंचा कोई मंदिर नहीं है। शिवरात्रि के अवसर पर यहां खुब मेला लगता है। और भंडारा होता है। रविवार को यहां पूरे साल भंडारा होता है।

     यहां आस पास घूमने लायक जगह.....

   हिमाचल तो वैसे भी प्राकृतिक छटाओं से भरपूर जगह है। यहां घूमने के बहुत सारे जगह है लेकिन अगर आप सिर्फ सोलन और जटोली शिव मंदिर के लिए आए हैं तो यहां के आसपास भी घुम ले। यहां भी घूमने के बहुत सारे जगह है...

     सोलन माता- यह माता शूलिनी का मंदिर है। यहां जून के अंतिम सप्ताह में शुलिन महोत्सव लगता है। माता शुलिनी को मां दुर्गा की छोटी बहन माना जाता है। तीन दिन का मेला लगता है यहां। यह बहुत प्राचीन मंदिर है।

     कुथार का किला, अर्की, जवाहर पार्क, बरौग, सिरमौर और भी खुबसूरती है यहां जो आगे के पोस्ट में आपको बताएंगे।

बुधवार, 13 नवंबर 2019

अयोध्या जाएं तो यहां भी घुमने अवश्य जाएं

       सुप्रीम कोर्ट ने जब से मंदिर बनाने का ऐलान किया है बहुत लोगों की इच्छा अयोध्या जाने की हो गई होगी। इससे पहले भी बहुत लोग वहां जाते ही थे।सरयू नदी के तट पर बसी अयोध्या जो भगवान राम की जन्मभूमि है, उनका नगर है। यहां से हमारी धार्मिक और ऐतिहासिक जुड़ाव है। युगों-युगों से हमारे पुरखे यहां पूजा करने जाते रहे हैं। यहां राम की पौड़ी, हनुमानगढ़ी, नागेश्वरनाथ मंदिर और भी बहुत जगह घुमने‌ लायक है। पहले अयोध्या का नाम फैजाबाद था। अयोध्या जाएं तो अवश्य इन जगहों पर जाएं....











Photo credit - Google
     हनुमानगढ़ी- अयोध्या शहर के ‌बीच में हनुमान जी का एक भव्य विशाल मंदिर है। जहां भगवान राम खुद वास करते हो‌ बिना हनुमान के वो‌‌ हो सकते हैं इसलिए कहा जाता है कि सबसे पहले हनुमान जी का आशीर्वाद लें, उनका दर्शन करें फिर कहीं घूमने जाएं। इस मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में हुआ था। यह बहुत ऊंचा पहाड़ पर स्थित है, यहां 76 सीढ़ी चढ़ कर जाना पड़ता है।यह मंदिर राजद्वार के ठीक सामने है, कहा जाता है हनुमानजी इसी पहाड़ की गुफा में रामजन्म भूमि की रक्षा करते थे।

      इस मंदिर के बारे में एक कहानी है कि 10 वीं शताब्दी में सुल्तान मंसूर अली जो वहां अयोध्या यानि तब का फैजाबाद का राज़ा था।एक बार उसके बेटे की तबीयत बहुत खराब हो गई,नाड़ी पकड़ में नहीं आ रहा था। मंदिर में हनुमान जी का बाल रुप है जिसमें माता अंजना गोद में हनुमान जी को लिटाए हुए हैं। सुल्तान मंसूर अली ने अपने बेटे को माता अंजना के सामने लिटा दिया,और सर झुका ठीक होने की कामना करने लगा कि तभी उसके बेटे की धड़कन वापस आ गई।

       तब उसने एलान किया कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। वहां लिखवा दिया कोई इसपर कब्जा नहीं करेगा। ना इस मंदिर के चढ़ावे पर कोई टैक्स लगेगा।

     कनकभवन - भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में कनकभवन वहीं जगह है जहां सीता राम वास करते थे। यह भवन माता कैकेई ने सीता माता को शादी के बाद मुंह दिखाई में भेंट किया था। कहा जाता कैकेई खुद विश्वकर्मा भगवान को अपनी देखरेख में यह भवन बनबाया‌ था। अभी भवन की जीर्ण होने के बाद ओरछा के महाराज महेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी महारानी ‌वृषभानु देवी ने अपने देख रेख‌ में ठीक करवाया। कहते हैं इस महल‌ में सीता राम के अलावा किसी को जाना ऐलाव नहीं था। हनुमान जी जो राम के परमभक्त वो भी बस आंगन‌ तक जा पाए थे।

    मणि पर्वत - यह पर्वत 65 फीट ऊंचा एक पहाड़ है। कहा जाता है हनुमानजी जब लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी ला रहे थे तो यहां कुछ पर्वत का अंश गिर गया था। यहां सावन माह में झुलन महोत्सव होता है। यहां के पुजारी के अनुसार यह झूलन महोत्सव खुद माता सीता ने शुरू किया था।

     सीता की रसोई- जहां माता सीता ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ खाना बनाती थी। पंच ऋषियों को भोजन कराते थे।आज भी वहां प्रतिकात्मक स्वरुप पंच ऋषि, राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और उनकी पत्नी उर्मिला, मांडवी, सीता सब की मुर्तियां रखी है। बर्तन भी प्लेट, हांडी सब रखें हुए हैं।

    दशरथ भवन, गुलाब बाड़ी, मोतिमहल, गुप्तारघाट, त्रेता‌ के‌ ठाकुर, नागेश्वर नाथ मंदिर,  तुलसी उद्दान, ऋषव देव राजघाट उद्दान, राम की पौड़ी, चक्रहर जी‌ विष्णु मंदिर और भी बहुत सारी‌ जगह है जहां ‌‌‌‌आप घूम सकते हैं।